
How to Plant Soapnut Tree in Hindi: रीठा एक बहुउपयोगी, औषधीय और प्राकृतिक डिटर्जेंट फल देने वाला पेड़ है। इसकी मांग हर्बल शैंपू, साबुन, आयुर्वेदिक दवाइयों और ऑर्गेनिक उत्पादों में लगातार बढ़ रही है। यह एक दीर्घकालिक, कम देखभाल वाली और लाभकारी फसल है।
यह लेख रीठा की खेती के लिए सही हालात के बारे में बताता है, साथ ही किसानों को इस अनोखी फसल से मिलने वाले आर्थिक मौकों के बारे में भी बताता है। ऑर्गेनिक और सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स की तरफ दुनिया भर में बढ़ते ट्रेंड के साथ, रीठा (Soapnut) की खेती किसानों के लिए लाभदायक हो सकती है।
रीठा के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Soapnut)
रीठा (Soapnut) की खेती के लिए उपोष्णकटिबंधीय से समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है। 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके विकास के लिए अच्छा माना जाता है। यह पौधा हल्की ठंड सहन कर सकता है, लेकिन अत्यधिक पाला हानिकारक हो सकता है। 100 से 200 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र इसके लिए आदर्श हैं। पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।
रीठा के लिए मिट्टी का चयन (Soil Selection for Soapnut)
रीठा (Soapnut) अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी में बेहतर बढ़ता है। भारी और जलभराव वाली मिट्टी इसके लिए उपयुक्त नहीं है। मिट्टी का पीएच मान 6 से 8 के बीच होना चाहिए। रोपण से पहले खेत की गहरी जुताई कर खरपतवार निकाल देना चाहिए। भूमि में पर्याप्त जैविक पदार्थ होने से पौधों की वृद्धि बेहतर होती है।
रीठा की उन्नत किस्में (Improved Soapnut Varieties)
रीठा (Soapnut) की भारत में मुख्यत: दो प्रजातियाँ प्रचलित हैं- सैपिंडस मुकोरोसीऔर सैपिंडस ट्राइफोलिएटस। व्यावसायिक दृष्टि से सैपिंडस मुकोरोसी अधिक लाभकारी है क्योंकि इसमें फल बड़े और अधिक सैपोनिन युक्त होते हैं। यह उत्तर भारत में अधिक प्रचलित है। दक्षिण भारत में ट्राइफोलिएटस किस्म पाई जाती है। क्षेत्र के अनुसार उपयुक्त किस्म का चयन करना चाहिए।
रीठा के पौधे तैयार करना (Preparing Soapnut Plants)
रीठा (Soapnut) की पौध बीज से तैयार की जाती है। पके हुए फलों से बीज निकालकर साफ कर लें। बीजों को 24 घंटे गुनगुने पानी में भिगोने से अंकुरण अच्छा होता है। नर्सरी में पॉलीबैग में गोबर खाद और मिट्टी का मिश्रण भरकर बीज बोएँ। लगभग 20–25 दिनों में अंकुरण हो जाता है। 8–10 महीने बाद पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं।
रीठा के बीज का उपचार (Treatment of Soapnut Seeds)
बीजों का बाहरी आवरण कठोर होता है, इसलिए अंकुरण बढ़ाने के लिए हल्की रगड़ाई (स्केरिफिकेशन) या गुनगुने पानी में भिगोना लाभकारी होता है। रीठा (Soapnut) के उपचारित बीजों को छायादार स्थान पर बोना चाहिए। नियमित हल्की सिंचाई आवश्यक है। अंकुरण के बाद पौधों को तेज धूप और तेज हवा से बचाना चाहिए।
रीठा के लिए खेत की तैयारी (Field Preparation for Soapnut)
खेत की दो से तीन गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लें। खरपतवार पूरी तरह हटा दें। समतलीकरण के बाद निर्धारित दूरी पर गड्ढे खोदें। प्रत्येक गड्ढे में अच्छी तरह सड़ी गोबर खाद मिलाएँ। रीठा (Soapnut) का वर्षा ऋतु में रोपण करना सर्वोत्तम रहता है।
रीठा के लिए गड्ढों का आकार (Size of Soapnut Pits)
गड्ढों का आकार लगभग 1x1x1 मीटर होना चाहिए। गड्ढे की मिट्टी में 15-20 किलो गोबर खाद और थोड़ी नीम खली मिलाकर भराई करें। भराई के बाद कुछ दिन खुला छोड़ दें ताकि कीटाणु नष्ट हो जाएँ। इससे रीठा (Soapnut) के पौधों की प्रारंभिक वृद्धि अच्छी होती है।
रीठा के रोपण का समय और दूरी (Spacing for Reetha Planting)
रीठा (Soapnut) की रोपाई जुलाई से अगस्त के बीच वर्षा ऋतु में करना उपयुक्त रहता है। पौधों के बीच 8×8 मीटर या 10×10 मीटर दूरी रखें। उचित दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त धूप और पोषण मिलता है तथा भविष्य में शाखाओं के फैलाव में बाधा नहीं आती।
रीठा के लिए खाद और उर्वरक (Manure and Fertilizer for Soapnut)
प्रारंभिक वर्षों में प्रति पौधा 15-20 किलो गोबर खाद देना चाहिए। साथ ही संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश देना लाभकारी होता है। रीठा की (Soapnut) जैविक खेती में वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत का उपयोग किया जा सकता है। तीसरे वर्ष के बाद उर्वरक की आवश्यकता कम हो जाती है।
रीठा के लिए सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management for Soapnut)
रीठा (Soapnut) की रोपाई के बाद पहले 2-3 वर्षों तक नियमित सिंचाई आवश्यक है। गर्मी के मौसम में 15-20 दिन के अंतराल पर पानी दें। वर्षा ऋतु में अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। जलभराव से बचाना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इससे जड़ सड़न हो सकती है।
रीठा में खरपतवार नियंत्रण (Weed Control in Soapnut)
प्रारंभिक अवस्था में खरपतवार नियंत्रण आवश्यक है। वर्ष में 2-3 बार निराई-गुड़ाई करें। इससे मिट्टी में वायु संचार बढ़ता है और रीठा (Soapnut) के पौधों की वृद्धि बेहतर होती है। मल्चिंग करने से खरपतवार कम उगते हैं और नमी संरक्षित रहती है।
रीठा में कीट और रोग नियंत्रण (Pest and Disease Control in Soapnut)
रीठा (Soapnut) में सामान्यत: कम कीट और रोग लगते हैं। दीमक और पत्ती खाने वाले कीट से बचाव के लिए नीम तेल या जैविक कीटनाशक का छिड़काव करें। समय-समय पर निरीक्षण करना आवश्यक है। रासायनिक दवाओं का उपयोग कम से कम करें।
रीठा की छंटाई और पौध संरक्षण (Pruning and Plant Protection of Reetha)
सूखी और रोगग्रस्त शाखाओं की समय-समय पर छंटाई करनी चाहिए। इससे रीठा (Soapnut) के पौधे का आकार संतुलित रहता है और नई शाखाएँ निकलती हैं। पौधों को पशुओं से बचाने के लिए बाड़ लगाना उपयोगी होता है।
रीठा के साथ अंतरवर्तीय खेती (Intercropping with Soapnut)
रीठा (Soapnut) में प्रारंभिक 3-4 वर्षों तक जब तक पेड़ छोटे हों, उनके बीच दलहन, तिलहन या सब्जियों की खेती की जा सकती है। इससे अतिरिक्त आय प्राप्त होती है और भूमि का बेहतर उपयोग होता है।
रीठा के फल लगना और उत्पादन (Reetha Fruiting and Production)
रीठा (Soapnut) में 4-5 वर्ष बाद फल लगना शुरू होता है। 8-10 वर्षों में पूर्ण उत्पादन मिलता है। एक परिपक्व पेड़ से 30-50 किलो तक फल प्राप्त हो सकते हैं। यह वृक्ष लगभग 25-30 वर्षों तक उत्पादन देता है।
रीठा की कटाई की विधि (Soapnut Harvesting Method)
रीठा (Soapnut) के फल नवंबर–दिसंबर में पकते हैं। पके फल पीले-भूरे रंग के हो जाते हैं। इन्हें पेड़ से तोड़कर या जमीन पर गिरे हुए फलों को इकट्ठा कर लिया जाता है। समय पर कटाई करने से गुणवत्ता बेहतर रहती है।
रीठा के फल सुखाना और भंडारण (Drying and Storage of Reetha Fruit)
कटाई के बाद रीठा (Soapnut) के फलों को धूप में अच्छी तरह सुखाएँ। सूखने के बाद इन्हें सूखी और हवादार जगह पर बोरी में भरकर रखें। नमी से बचाव आवश्यक है, अन्यथा फफूंद लग सकती है। सही भंडारण से फल 1-2 वर्ष तक सुरक्षित रहते हैं।
रीठा की प्रति एकड़ उपज (Soapnut Yield Per Acre)
लगभग 40-60 पौधे प्रति एकड़ लगाए जा सकते हैं। पूर्ण उत्पादन पर 15-20 क्विंटल सूखा रीठा (Soapnut) प्राप्त हो सकता है। उपज क्षेत्र, देखभाल और पौधों की उम्र पर निर्भर करती है।
निष्कर्ष: रीठा (Soapnut) की खेती दीर्घकालिक और लाभकारी विकल्प है। कम देखभाल, बढ़ती बाजार मांग और पर्यावरण अनुकूल गुणों के कारण यह किसानों के लिए आय का अच्छा स्रोत बन सकती है। उचित प्रबंधन और विपणन रणनीति से बेहतर लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न? (FAQs)
रीठा (Soapnut) के पौधे बीज द्वारा आसानी से उगाए जा सकते हैं। बीजों को 24-48 घंटे गुनगुने पानी में भिगोने या रगड़ने के बाद, वसंत ऋतु में गमले या जमीन में 1-2 सेमी गहराई में बोएं। उन्हें अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी, पूर्ण सूर्यप्रकाश और नियमित पानी की आवश्यकता होती है। यह पौधा 8-10 वर्षों में फल देना शुरू करता है।
रीठा (Soapnut) उपोष्णकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय जलवायु में अच्छी तरह बढ़ता है। 20 से 35°C तापमान और मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र इसके लिए उपयुक्त हैं। हल्की ठंड सहन कर सकता है, लेकिन पाला पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है।
भारत में मुख्यत: सैपिंडस मुकोरोसी और सैपिंडस ट्राइफोलिएटस की खेती की जाती है। इनमें सैपिंडस मुकोरोसी व्यावसायिक रूप से अधिक लोकप्रिय है, क्योंकि इस रीठा (Soapnut) के फल बड़े, भारी और अधिक सैपोनिन युक्त होते हैं।
रीठा (Soapnut) के लिए अच्छी जल निकास वाली दोमट या हल्की बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है। मिट्टी का पीएच 6.5 से 8.0 के बीच होना चाहिए। जलभराव वाली भूमि से बचना चाहिए क्योंकि इससे जड़ों में सड़न हो सकती है।
रीठा (Soapnut) के पौधे सामान्यतः 8×8 मीटर या 10×10 मीटर दूरी पर लगाए जाते हैं। पर्याप्त दूरी रखने से पौधों को धूप, हवा और पोषक तत्व सही मात्रा में मिलते हैं, जिससे पेड़ों का विकास और फल उत्पादन बेहतर होता है।
रीठा (Soapnut) का पौधा आमतौर पर 5-7 वर्ष बाद फल देना शुरू करता है। 10–12 वर्ष में पेड़ पूर्ण उत्पादन पर पहुंच जाता है। अच्छी देखभाल, खाद और सिंचाई से उत्पादन क्षमता में वृद्धि संभव है।
एक परिपक्व रीठा (Soapnut) पेड़ से औसतन 30-50 किलोग्राम फल प्राप्त हो सकते हैं। उत्पादन जलवायु, मिट्टी, देखभाल और प्रबंधन पर निर्भर करता है। बेहतर प्रबंधन से उपज में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।
रीठा (Soapnut) में प्राकृतिक सैपोनिन पाया जाता है, जिसका उपयोग हर्बल शैम्पू, साबुन, डिटर्जेंट, आयुर्वेदिक औषधि और जैविक कीटनाशकों में होता है। पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण इसकी व्यावसायिक उपयोगिता लगातार बढ़ रही है।





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