
How to Grow Pyrethrum in Hindi: पाइरेथ्रम की खेती ने एक प्राकृतिक कीटनाशक और औषधी के रूप में अपनी भूमिका और किसानों के लिए इसकी आर्थिक क्षमता के कारण काफी ध्यान आकर्षित किया है। पाइरेथ्रम के पौधे के फूलों से मिलने वाला पाइरेथ्रम सिंथेटिक कीटनाशकों का एक पर्यावरण के अनुकूल विकल्प प्रदान करता है, जिससे यह स्थायी कृषि में तेजी से प्रासंगिक होता जा रहा है।
जैसे-जैसे ऑर्गेनिक और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों की मांग बढ़ रही है, पाइरेथ्रम से जुड़ी खेती के तरीकों, चुनौतियों और बाजार के अवसरों को समझना जरूरी हो जाता है। यह लेख पाइरेथ्रम (Pyrethrum) की खेती के विभिन्न पहलुओं पर गहराई से चर्चा करता है, जिसमें इसकी खेती के लिए आदर्श परिस्थितियाँ, कीट प्रबंधन रणनीतियाँ और उपज की संभावनाओं का पता लगाया गया है।
पायरेथ्रम के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Pyrethrum)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की खेती के लिए समशीतोष्ण और उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। यह फसल ठंडी जलवायु में अच्छी बढ़वार करती है तथा अधिक तापमान इसके लिए हानिकारक होता है। 15-25°C तापमान इसकी वृद्धि के लिए आदर्श है।
अत्यधिक वर्षा एवं पाला दोनों ही पायरेथ्रम की फसल को नुकसान पहुँचाते हैं। 100 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा (750 मिमी से ऊपर) आदर्श है। फूल आने के लिए 17°C से नीचे तापमान की आवश्यकता होती है।
पायरेथ्रम के लिए भूमि का चयन (Soil Selection for Pyrethrum)
पायरेथ्रम की खेती के लिए मिट्टी की बात करें तो हल्की दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है। मिट्टी में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि जलभराव से जड़ सड़न की समस्या उत्पन्न हो जाती है। मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए।
जैविक पदार्थों से युक्त उपजाऊ मिट्टी में पायरेथ्रम (Pyrethrum) की पैदावार बेहतर होती है। यह पौधा 1800 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले ठंडे स्थानों में अच्छी तरह से पनपता है।
पायरेथ्रम की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Pyrethrums)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की उन्नत किस्मों का चयन अधिक उपज और उच्च पाइरेथ्रिन मात्रा प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। भारत में सामान्यत: क्राइसेंथेमम सिनेरारिफोलियम प्रजाति की किस्में उगाई जाती हैं। केन्या पायरेथ्रम, टीना, पीवाईसी- 1 तथा पीवाईसी- 2 प्रमुख उन्नत किस्में मानी जाती हैं।
ये किस्में रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली होती हैं तथा फूलों में अधिक पाइरेथ्रिन पाया जाता है। उन्नत किस्मों की विशेषता यह है कि इनमें फूल अधिक लगते हैं, पौधे लंबे समय तक उत्पादन देते हैं और गुणवत्ता भी बेहतर होती है। सही किस्म का चयन करने से किसान को अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
पायरेथ्रम के लिए भूमि की तैयारी (Land Preparation for Pyrethrum)
पायरेथ्रम की खेती के लिए भूमि को अच्छी तरह तैयार करना अत्यंत आवश्यक है। सबसे पहले खेत की गहरी जुताई की जाती है, जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए और पुराने खरपतवार नष्ट हो जाएँ। इसके बाद 2-3 बार हल्की जुताई कर खेत को समतल किया जाता है। अंतिम जुताई के समय सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट मिट्टी में मिला देना चाहिए।
भूमि की तैयारी करते समय जल निकास की उचित व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए। खेत में पलेवा करके मिट्टी में नमी बनाए रखी जाती है, जिससे रोपाई के समय पायरेथ्रम (Pyrethrum) के पौधों की स्थापना अच्छी हो सके। अच्छी तरह तैयार भूमि में पौधों की जड़ें मजबूत बनती हैं।
पायरेथ्रम के बीज एवं रोपण विधि (Pyrethrum Seeds and Planting Method)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) का प्रजनन सामान्यत: बीज द्वारा किया जाता है। बीज बहुत छोटे होते हैं, इसलिए इन्हें सीधे खेत में न बोकर नर्सरी में तैयार किया जाता है। बीजों को हल्की मिट्टी में छिड़काव विधि से बोया जाता है और ऊपर से पतली मिट्टी या बालू की परत डाल दी जाती है।
बीज बोने के बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। लगभग 20-25 दिनों में पौध तैयार हो जाती है। स्वस्थ एवं रोगमुक्त पौधों का चयन कर मुख्य खेत में रोपाई की जाती है। रोपण के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए ताकि पौधे अच्छी तरह जम सकें।
पायरेथ्रम के लिए नर्सरी प्रबंधन (Pyrethrum Nursery Management)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की सफल खेती के लिए नर्सरी प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण है। नर्सरी के लिए ऊँची एवं अच्छी जल निकास वाली भूमि का चयन करना चाहिए। मिट्टी को भुरभुरा बनाकर उसमें गोबर की खाद मिलाई जाती है। बीजों को समान रूप से क्यारियों में बोया जाता है।
अंकुरण के बाद पौधों को अत्यधिक धूप, वर्षा एवं कीटों से बचाने की आवश्यकता होती है। समय-समय पर हल्की सिंचाई की जाती है ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। नर्सरी में खरपतवार नियंत्रण एवं रोगग्रस्त पौधों को हटाना जरूरी होता है। लगभग 6-8 सप्ताह में पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।
पायरेथ्रम की रोपाई का समय और दूरी (Pyrethrum Planting Time and Spacing)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की रोपाई सामान्यतः ठंडे मौसम में की जाती है। भारत में इसकी रोपाई अक्टूबर से नवंबर के बीच उपयुक्त मानी जाती है। इस समय तापमान अनुकूल रहता है, जिससे पौधों की वृद्धि अच्छी होती है। रोपाई के लिए स्वस्थ एवं मजबूत पौधों का चयन करना चाहिए।
पौधे से पौधे की दूरी लगभग 45 सेमी तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सेमी रखी जाती है। उचित दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त धूप, पोषक तत्व एवं वायु मिलती है। इससे रोगों का प्रकोप कम होता है और फूलों की संख्या एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
पायरेथ्रम के लिए खाद और उर्वरक (Fertilizer and Manure for Pyrethrum)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की अच्छी उपज के लिए संतुलित खाद एवं उर्वरक प्रबंधन आवश्यक है। भूमि की तैयारी के समय 15-20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए। इसके अतिरिक्त नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की उचित मात्रा दी जाती है।
सामान्यतः 60:40:40 किग्रा एनपीके प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। नाइट्रोजन को दो भागों में बाँटकर देना लाभकारी रहता है। पहली खुराक रोपाई के समय तथा दूसरी फूल आने से पहले दी जाती है। जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता में सुधार होता है।
पायरेथ्रम के लिए सिंचाई व्यवस्था (Irrigation System for Pyrethrum)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती, परंतु नमी का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए ताकि पौधे अच्छी तरह जम सकें। इसके बाद आवश्यकता अनुसार 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जाती है।
फूल आने के समय नमी का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जलभराव से पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं, इसलिए खेत में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। वर्षा ऋतु में अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। उचित सिंचाई प्रबंधन से पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और फूलों की उपज बढ़ती है।
पायरेथ्रम में खरपतवार नियंत्रण (Weed Control in Pyrethrum Cultivation)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की प्रारंभिक अवस्था में खरपतवार फसल को अधिक नुकसान पहुँचाते हैं। खरपतवार पोषक तत्वों, पानी एवं प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसलिए समय पर खरपतवार नियंत्रण आवश्यक है। रोपाई के 20-25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई की जाती है। इसके बाद आवश्यकता अनुसार 2-3 निराई की जा सकती हैं।
हाथ से निराई सबसे सुरक्षित एवं प्रभावी तरीका माना जाता है। कुछ किसान खरपतवारनाशी रसायनों का भी उपयोग करते हैं, लेकिन इनका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए। नियमित खरपतवार नियंत्रण से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और उपज में वृद्धि होती है।
पायरेथ्रम में कीट और रोग नियंत्रण (Pest and Disease Control in Pyrethrum)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की फसल में सामान्यतः एफिड, थ्रिप्स एवं इल्ली जैसे कीटों का प्रकोप देखा जाता है। ये कीट पौधों का रस चूसकर उनकी वृद्धि को प्रभावित करते हैं। नियंत्रण के लिए नीम आधारित कीटनाशकों का उपयोग लाभकारी रहता है। रोगों में जड़ सड़न एवं पत्ती धब्बा प्रमुख हैं।
जलभराव से जड़ सड़न की समस्या बढ़ती है, इसलिए उचित जल निकास आवश्यक है। रोगग्रस्त पौधों को खेत से निकाल देना चाहिए। फसल चक्र अपनाने से रोगों का प्रकोप कम होता है। संतुलित खाद एवं उचित देखभाल से कीट एवं रोगों से बचाव संभव है।
पायरेथ्रम के फूलों की तुड़ाई (Harvesting Pyrethrums Flowers)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) में फूलों की तुड़ाई एक महत्वपूर्ण कार्य है। जब फूल पूरी तरह खिल जाएँ और पंखुड़ियाँ क्षैतिज स्थिति में आ जाएँ, तब तुड़ाई करना सबसे उपयुक्त रहता है। इसी अवस्था में फूलों में पाइरेथ्रिन की मात्रा अधिक होती है। तुड़ाई हाथ से या कैंची की सहायता से की जाती है।
फूलों को सावधानीपूर्वक तोड़ा जाता है ताकि पौधे को नुकसान न पहुँचे। पहली तुड़ाई रोपाई के लगभग 4–5 महीने बाद शुरू हो जाती है। इसके बाद 2–3 सप्ताह के अंतराल पर कई बार तुड़ाई की जा सकती है।
पायरेथ्रम की खेती से उपज (Yield from Pyrethrums Cultivation)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की उपज भूमि, जलवायु, किस्म एवं देखभाल पर निर्भर करती है। सामान्यतः एक हेक्टेयर क्षेत्र से 800 से 1200 किलोग्राम सूखे फूल प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्नत किस्मों एवं बेहतर प्रबंधन से उपज में और वृद्धि संभव है। फूलों में पाइरेथ्रिन की मात्रा 1 से 2 प्रतिशत तक पाई जाती है।
अच्छी कृषि विधियाँ अपनाने पर फसल 3-4 वर्षों तक उत्पादन देती है। पायरेथ्रम की फसल किसानों के लिए एक लाभकारी औषधीय एवं औद्योगिक फसल मानी जाती है, जिससे उन्हें स्थायी आय का स्रोत मिलता है।
पायरेथ्रम का भंडारण एवं प्रसंस्करण (Pyrethrum Storage and Processing)
तुड़ाई के बाद पायरेथ्रम (Pyrethrum) के फूलों को छाया में सुखाया जाता है। तेज धूप में सुखाने से पाइरेथ्रिन की मात्रा कम हो सकती है। सूखने के बाद फूलों को नमी रहित एवं हवादार स्थान पर संग्रहित किया जाता है। भंडारण के लिए जूट या कागज की बोरियों का उपयोग किया जाता है।
प्रसंस्करण के दौरान फूलों से पाइरेथ्रिन निकाला जाता है, जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने में किया जाता है। सही भंडारण एवं प्रसंस्करण से उत्पाद की गुणवत्ता बनी रहती है और बाजार में अच्छा मूल्य प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न? (FAQs)
पायरेथ्रम (Pyrethrum) एक औषधीय एवं कीटनाशी पौधा है, जिसके फूलों से पाइरेथ्रिन नामक प्राकृतिक कीटनाशक प्राप्त होता है। इसका उपयोग कृषि, घरेलू कीट नियंत्रण तथा दवा उद्योग में किया जाता है।
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की खेती प्राकृतिक कीटनाशक औषधि के लिए की जाने वाली एक अत्यंत लाभकारी नकदी फसल है। जिसके फूलों का उपयोग मच्छर भगाने वाली कॉइल और जैविक कीटनाशकों में होता है। इसकी खेती के लिए ठंडी जलवायु (15-24°C), अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी (पीएच 5.6 से अधिक) और भरपूर धूप की आवश्यकता होती है।
पायरेथ्रम (Pyrethrum) के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। 15-25°C तापमान इसकी वृद्धि के लिए आदर्श है। अत्यधिक गर्मी, पाला एवं जलभराव इस फसल के लिए हानिकारक होते हैं।
हल्की दोमट या बलुई दोमट मिट्टी पायरेथ्रम (Pyrethrum) की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। मिट्टी में जल निकास अच्छा होना चाहिए तथा पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए।
पायरेथ्रम (Pyrethrum) का प्रजनन मुख्य रूप से बीज द्वारा किया जाता है। बीज पहले नर्सरी में बोए जाते हैं और तैयार पौधों को बाद में मुख्य खेत में रोपित किया जाता है।
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की रोपाई ठंडे मौसम में की जाती है। भारत में अक्टूबर से नवंबर का समय रोपाई के लिए उपयुक्त माना जाता है, जिससे पौधों की अच्छी बढ़वार होती है।
खाद एवं उर्वरक पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। इससे पौधों की वृद्धि, फूलों की संख्या एवं पाइरेथ्रिन (Pyrethrum) की मात्रा बढ़ती है, जिससे उपज और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है।
पायरेथ्रम (Pyrethrum) में हल्की एवं सीमित सिंचाई की जाती है। रोपाई के बाद सिंचाई आवश्यक होती है, इसके बाद 10-15 दिन के अंतराल पर पानी देना पर्याप्त रहता है।
जब फूल पूरी तरह खिल जाते हैं और पंखुड़ियाँ क्षैतिज अवस्था में आ जाती हैं, तब फूलों की तुड़ाई की जाती है। इसी अवस्था में पाइरेथ्रिन (Pyrethrum) की मात्रा अधिक होती है।
सामान्यत: पायरेथ्रम (Pyrethrum) से प्रति हेक्टेयर 800 से 1200 किलोग्राम सूखे फूल प्राप्त होते हैं। उपज किस्म, जलवायु और कृषि प्रबंधन पर निर्भर करती है।
हाँ, पाइरेथ्रम (Pyrethrum) को बगीचे में आसानी से उगाया जा सकता है। यह एक बारहमासी डेजी जैसा पौधा है, जिसे प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में उपयोग करने के लिए बॉर्डर या फूलों की क्यारियों में उगाया जाता है। इन्हें धूप वाली जगह और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है, और यह कीड़ों को दूर रखने में मदद करता है।
पायरेथ्रम (Pyrethrum) की खेती मुख्य रूप से इसके फूलों से प्राकृतिक कीटनाशक पायरेथ्रिन प्राप्त करने के लिए की जाती है। यह एक जैविक और पर्यावरण के अनुकूल कीटनाशक है, जिसका उपयोग कृषि, घरेलू कीटनाशकों, पालतू जानवरों की देखभाल और मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
सिर की जूँ और त्वचा पर लगने वाली जूँ, 0.17% से 0.33% की सांद्रता में पाइरेथ्रिन (Pyrethrum) को 12-24 घंटे तक त्वचा पर लगाने से सिर की जूँ और त्वचा पर लगने वाली जूँ का इलाज प्रभावी होता है। प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए पाइरेथ्रिन को आमतौर पर पाइपरॉनिल ब्यूटोक्साइड (2% से 4%) के साथ मिलाया जाता है।





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