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Home » Blog » Patchouli Farming in Hindi: पचौली की खेती कैसे करें

Patchouli Farming in Hindi: पचौली की खेती कैसे करें

January 12, 2026 by Bhupendra Dahiya Leave a Comment

Patchouli Farming in Hindi: पचौली की खेती कैसे करें

How to Grow Patchouli in Hindi: पचौली की खेती ने अपनी आर्थिक क्षमता और ग्लोबल मार्केट में नेचुरल एसेंशियल ऑयल की बढ़ती डिमांड के कारण काफी ध्यान खींचा है। अपनी खास खुशबू और थेराप्यूटिक गुणों के लिए मशहूर, पचौली तेल का इस्तेमाल परफ्यूम, कॉस्मेटिक्स और पारंपरिक दवाओं में बड़े पैमाने पर होता है। इसका इतिहास दक्षिण पूर्व एशिया से इसकी शुरुआत से जुड़ा है, जहाँ यह ट्रॉपिकल मौसम और उपजाऊ मिट्टी में खूब फलता-फूलता था।

आज, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे क्षेत्र पचौली (Patchouli) की खेती में सबसे आगे हैं, जो पैदावार और क्वालिटी को बेहतर बनाने के लिए पारंपरिक और आधुनिक दोनों तरह की खेती की तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह लेख पचौली की खेती के अलग-अलग पहलुओं के बारे में बताता है, जिसमें खेती के लिए सही स्थितियाँ, सबसे अच्छे तरीके, कीट प्रबंधन और इस खुशबूदार जड़ी-बूटी का आर्थिक महत्व शामिल है।

Table of Contents

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  • पचौली के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Patchouli)
  • पचौली के लिए भूमि का चयन (Soil Selection for Patchouli)
  • पचौली के लिए खेत की तैयारी (Field Preparation for Patchouli)
  • पचौली की किस्म का चयन (Selection of Patchouli Varieties)
  • पचौली के लिए रोपाई की विधि (Patchoulis Planting Method)
  • पचौली के लिए खाद और उर्वरक (Fertilization and Manuring for Patchouli)
  • पचौली में सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण (Irrigation and Weed Control in Patchouli)
  • पचौली में रोग और कीट नियंत्रण (Disease and Pest Control in Patchouli)
  • पचौली की कटाई और उपज (Patchoulis Harvesting and Yield)
  • पचौली का तेल निष्कर्षण और भंडारण (Patchouli Oil Extraction and Storage)
  • पचौली से आर्थिक लाभ और विपणन (Benefits and Marketing of Patchouli)
  • पचौली पर निष्कर्ष (Conclusion on Patchoulis)
  • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न? (FAQs)

पचौली के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Patchouli)

पचौली (Patchouli) की सफल खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है। 22 से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके विकास के लिए आदर्श होता है। अत्यधिक ठंड या पाला पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है। जहां तक वर्षा की बात है, 150 से 300 सेंटीमीटर तक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र पचौली के लिए अनुकूल होते हैं।

पचौली के लिए भूमि का चयन (Soil Selection for Patchouli)

पचौली की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली, कार्बनिक पदार्थों से भरपूर, भुरभुरी और थोड़ी अम्लीय (पीएच 5.5-6.5) मिट्टी आदर्श है, हल्की रेतीली दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है, जहाँ 150-300 सेमी बारिश और 70-75% नमी हो, और आदर्श रूप से नारियल या रबड़ जैसी लंबी फसलों की कुछ छाया हो, क्योंकि यह ट्रॉपिकल/सबट्रॉपिकल इलाकों में और हल्की छाया में बेहतर तेल क्वालिटी के लिए अच्छी तरह उगता है।

पचौली (Patchouli) को नेमाटोड की समस्याओं से बचने के लिए अच्छी ड्रेनेज बहुत जरूरी है और जमीन की तैयारी में भरपूर ऑर्गेनिक पदार्थ के साथ बारीक जुताई पर ध्यान देना चाहिए।

पचौली के लिए खेत की तैयारी (Field Preparation for Patchouli)

पचौली (Patchouli) की खेती से पहले खेत की गहरी जुताई करना आवश्यक है ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए और खरपतवार नष्ट हो जाएं। इसके बाद 2-3 हल्की जुताइयाँ कर खेत को समतल कर लिया जाता है। अंतिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर 10-15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि जलभराव से पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं।

पचौली की किस्म का चयन (Selection of Patchouli Varieties)

पचौली (Patchouli) की उन्नत और अधिक तेल देने वाली किस्मों का चयन करना उत्पादन और लाभ दोनों के लिए जरूरी है। भारत में जवाहर पचौली, समर्थ, आरोग्य और कुछ स्थानीय उन्नत किस्में प्रचलित हैं। अच्छी किस्में रोग प्रतिरोधक होती हैं और इनमें तेल की मात्रा अधिक पाई जाती है, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिलती है।

पचौली के लिए रोपाई की विधि (Patchoulis Planting Method)

पचौली (Patchouli) का प्रवर्धन मुख्यत: तने की कलमों द्वारा किया जाता है। स्वस्थ और रोगमुक्त पौधों से 10-15 सेंटीमीटर लंबी कलमें काटकर नर्सरी में तैयार की जाती हैं। लगभग 4-6 सप्ताह में ये कलमें रोपाई के लिए तैयार हो जाती हैं। खेत में रोपाई के लिए कतार से कतार की दूरी 45-60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखी जाती है। रोपाई का उपयुक्त समय मानसून की शुरुआत या हल्की सिंचाई की सुविधा होने पर वर्ष में किसी भी समय हो सकता है।

पचौली के लिए खाद और उर्वरक (Fertilization and Manuring for Patchouli)

पचौली (Patchouli) की अच्छी वृद्धि के लिए संतुलित पोषण आवश्यक है। जैविक खाद के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग लाभकारी होता है। सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-50 किलोग्राम फास्फोरस और 40-50 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन को 2-3 भागों में बांटकर देना बेहतर रहता है। इसके अलावा जैव उर्वरकों और वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग से तेल की गुणवत्ता में भी सुधार होता है।

पचौली में सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण (Irrigation and Weed Control in Patchouli)

पचौली (Patchouli) को नियमित नमी की आवश्यकता होती है, लेकिन अधिक पानी नुकसानदायक हो सकता है। गर्मियों में 7-10 दिन के अंतराल पर और सर्दियों में 15-20 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जाती है। खरपतवार पौधों के पोषक तत्व छीन लेते हैं, इसलिए शुरुआती अवस्था में निराई-गुड़ाई आवश्यक होती है। जैविक मल्चिंग करने से खरपतवार कम उगते हैं और मिट्टी में नमी बनी रहती है।

पचौली में रोग और कीट नियंत्रण (Disease and Pest Control in Patchouli)

पचौली (Patchouli) में सामान्यत: पत्ती धब्बा रोग, जड़ सड़न और कुछ कीट जैसे एफिड्स और मिलीबग का प्रकोप देखा जा सकता है। रोगों से बचाव के लिए खेत में जलभराव न होने दें और रोगमुक्त पौध सामग्री का उपयोग करें। नीम आधारित जैव कीटनाशकों का प्रयोग पर्यावरण के अनुकूल और प्रभावी होता है। आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह से सीमित मात्रा में रासायनिक दवाओं का उपयोग किया जा सकता है।

पचौली की कटाई और उपज (Patchoulis Harvesting and Yield)

पचौली (Patchouli) की पहली कटाई रोपाई के लगभग 5-6 महीने बाद की जाती है, जब पौधों में अच्छी पत्तियाँ विकसित हो जाती हैं। इसके बाद हर 3-4 महीने के अंतराल पर कटाई की जा सकती है। एक वर्ष में 2-3 कटाइयाँ संभव होती हैं। उचित देखभाल से एक हेक्टेयर से 15-20 टन हरी पत्तियों की उपज प्राप्त की जा सकती है, जिससे लगभग 80-120 किलोग्राम पचौली तेल निकाला जा सकता है।

पचौली का तेल निष्कर्षण और भंडारण (Patchouli Oil Extraction and Storage)

पचौली (Patchouli) की कटाई के बाद पत्तियों को हल्की छाया में सुखाया जाता है ताकि तेल की मात्रा और गुणवत्ता बनी रहे। इसके बाद भाप आसवन विधि से तेल निकाला जाता है। निकाले गए तेल को साफ, सूखे और अंधेरे स्थान पर एयरटाइट कंटेनरों में संग्रहित किया जाता है। सही भंडारण से तेल की सुगंध और गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है।

पचौली से आर्थिक लाभ और विपणन (Benefits and Marketing of Patchouli)

पचौली (Patchouli) की खेती में प्रारंभिक लागत मध्यम होती है, लेकिन बाजार मूल्य अच्छा होने के कारण मुनाफा आकर्षक रहता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पचौली तेल की कीमत उच्च रहती है और निर्यात की भी व्यापक संभावनाएं हैं। किसान सीधे डिस्टिलेशन यूनिट लगाकर या प्रसंस्करण इकाइयों से जुड़कर अधिक लाभ कमा सकते हैं। औषधीय और सुगंधित पौधों की बढ़ती मांग को देखते हुए पचौली की खेती भविष्य में और भी लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

पचौली पर निष्कर्ष (Conclusion on Patchoulis)

पचौली (Patchouli) की खेती उन किसानों के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प है जो पारंपरिक फसलों से हटकर अधिक आय प्राप्त करना चाहते हैं। उचित जलवायु, सही तकनीक, संतुलित पोषण और समय पर कटाई से पचौली की खेती से निरंतर और स्थायी लाभ कमाया जा सकता है। सुगंधित तेलों की बढ़ती मांग के साथ पचौली न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि कृषि विविधीकरण को भी प्रोत्साहित करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न? (FAQs)

पचौली कैसे उगाएं?

पचौली (Patchouli) की खेती गर्म, आर्द्र जलवायु (22-30°C) और अच्छी जल निकासी वाली, जैविक पदार्थों से भरपूर मिट्टी (पीएच 5.5-6.5) में की जाती है, जिसमें 6-8 घंटे धूप मिले, और इसकी खेती से कम लागत में अच्छा मुनाफा मिलता है, क्योंकि इसके तेल की मांग परफ्यूम, दवाइयों और कॉस्मेटिक्स में होती है। रोपाई अगस्त-अक्टूबर के बीच कटिंग से होती है, और हर 3-4 महीने में कटाई संभव है, जिससे किसान साल भर कमाई कर सकते हैं।

पचौली की खेती किन क्षेत्रों में की जा सकती है?

पचौली (Patchouli) की खेती उष्ण एवं उपोष्ण क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है, जहाँ नमी और मध्यम तापमान रहता है।

पचौली के लिए कौन-सी जलवायु उपयुक्त होती है?

20-30°C तापमान और आर्द्र वातावरण पचौली (Patchouli) के लिए सर्वोत्तम होता है। अधिक ठंड और पाला नुकसानदायक है।

पचौली के लिए कौन-सी मिट्टी उपयुक्त होती है?

अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिसका पीएच 5.5–6.5 हो, पचौली (Patchouli) के लिए उपयुक्त होती है।

पचौली की खेती बीज से होती है या पौध से?

पचौली (Patchouli) की खेती बीज से नहीं, बल्कि कलम (कटिंग) या नर्सरी से तैयार पौध से की जाती है।

पचौली की रोपाई का सही समय क्या है?

फरवरी-मार्च और जून-जुलाई (मानसून) पचौली (Patchouli) की रोपाई के लिए उपयुक्त समय है।

पचौली के पौधों की दूरी कितनी रखनी चाहिए?

पचौली (Patchouli) के लिए कतार से कतार 45-60 सेमी और पौधे से पौधा 30-45 सेमी दूरी रखनी चाहिए।

पचौली में सिंचाई कितनी बार करनी चाहिए?

शुरुआत में 7-10 दिन में एक बार पचौली (Patchouli) की सिंचाई करें। बाद में आवश्यकता अनुसार सिंचाई करें, जलभराव से बचें।

पचौली में कौन-कौन से रोग और कीट लगते हैं?

पचौली (Patchouli) के प्रमुख रोगों में जड़ सड़न और पत्ती धब्बा रोग शामिल है, जबकि प्रमुख कीट में माहू और सफेद मक्खी शामिल है।

पचौली की पहली कटाई कब की जाती है?

पचौली (Patchouli) की रोपाई के लगभग 4-5 महीने बाद पहली कटाई की जाती है।

पचौली से कितनी बार कटाई ली जा सकती है?

पचौली (Patchouli) की हर 3-4 महीने में कटाई की जा सकती है और 2–3 वर्ष तक फसल ली जा सकती है।

पचौली का तेल कैसे निकाला जाता है?

सूखी पत्तियों से भाप आसवन विधि द्वारा पचौली (Patchouli) का तेल निकाला जाता है।

क्या पचौली को बगीचे में उगाया जा सकता है?

हाँ, पचौली (Patchouli) को बगीचे में आसानी से उगाया जा सकता है, खासकर गर्म और नम जलवायु में, जहाँ इसे अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी, भरपूर धूप या हल्की छाया और पर्याप्त नमी मिले; इसे गमलों में भी उगाया जा सकता है और ठंडे क्षेत्रों के लिए यह एक अच्छा विकल्प है।

पचौली के प्रमुख उपयोग क्या है?

पचौली (Patchouli) का मुख्य उपयोग इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, साबुन और डिटर्जेंट में सुगंध और स्थिरीकरण के लिए होता है, क्योंकि इसकी मिट्टी जैसी, मीठी और कस्तूरी जैसी खुशबू होती है। इसके अलावा, यह अरोमाथेरेपी, त्वचा और बालों की देखभाल (जैसे रूसी और एक्जिमा के लिए), और पारंपरिक चिकित्सा में सूजन-रोधी, फंगल-रोधी गुणों के लिए भी इस्तेमाल होता है।

पचौली के औषधीय लाभ क्या है?

पचौली (Patchouli) के कई औषधीय लाभ हैं, जिनमें एंटी-इंफ्लेमेटरी (सूजन-रोधी), एंटी-माइक्रोबियल (जीवाणुरोधी), और एंटीऑक्सीडेंट गुण शामिल हैं, जो त्वचा की समस्याओं (मुंहासे, एक्जिमा), तनाव, चिंता, सर्दी-खांसी, और पाचन में सुधार में मदद करते हैं, साथ ही मूड को अच्छा करते हैं और नींद को बढ़ावा देते हैं।

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