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Home » Blog » Palmarosa Farming in Hindi: रोशा घास की खेती कैसे करें

Palmarosa Farming in Hindi: रोशा घास की खेती कैसे करें

January 9, 2026 by Bhupendra Dahiya Leave a Comment

Palmarosa Farming in Hindi: रोशा घास की खेती कैसे करें

How to Grow Rosha Grass in Hindi: रोशा घास या पामारोसा (Palmarosa) एक खुशबूदार घास है, जो अपने एसेंशियल ऑयल के लिए जानी जाती है, जिसका इस्तेमाल परफ्यूम, कॉस्मेटिक और फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर होता है। इसकी बढ़ती ग्लोबल डिमांड, खासकर नेचुरल और ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स के क्षेत्र में, रोशा घास (सिंबोपोगोन मार्टिनी) की खेती भारत के किसानों के लिए एक फायदेमंद मौका है।

यह आर्टिकल रोशा घास (Palmarosa) की खेती के अलग-अलग पहलुओं के बारे में बताता है, जिसमें सही मौसम की स्थिति, मिट्टी की जरूरतें, खेती के तरीके, कीट प्रबंधन की रणनीतियाँ और आर्थिक फायदे शामिल हैं। रोशा घास की खेती की बारीकियों को समझकर, संबंधित लोग प्रोडक्शन की क्षमता बढ़ा सकते हैं और बढ़ते मार्केट पोटेंशियल का फायदा उठा सकते हैं।

Table of Contents

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  • रोशा घास के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Palmarosa)
  • रोशा घास के लिए भूमि का चयन (Land Selection for Palmarosa)
  • रोशा घास की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Rosha Grass)
  • रोशा घास नर्सरी प्रबंधन और रोपाई (Palmarosa Nursery and Transplanting)
  • रोशा घास के लिए खाद और उर्वरक (Manure and Fertilizers for Palmarosa)
  • रोशा घास में सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management of Palmarosa)
  • रोशा घास की फसल में खरपतवार नियंत्रण (Weed Control in Palmarosa)
  • रोशा घास में रोग और कीट नियंत्रण (Disease and Pest Control in Palmarosa)
  • रोशा घास की कटाई और उत्पादन (Rosha Grass Harvesting and Production)
  • रोशा घास से तेल निष्कर्षण की विधि (Method of Oil Extraction from Palmarosa)
  • रोशा घास का आर्थिक महत्व और लाभ (Economic Importance of Rosha Grass)
  • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न? (FAQs)

रोशा घास के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Palmarosa)

रोशा घास (Palmarosa) उष्ण और शुष्क जलवायु की फसल है। यह अधिक गर्मी सहन करने की क्षमता रखती है और 25 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में अच्छी तरह बढ़ती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी यह सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है, इसलिए यह सूखा प्रभावित इलाकों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। अधिक ठंड और पाला इस फसल के लिए हानिकारक होता है। अच्छी धूप मिलने पर पौधों की वृद्धि और तेल की मात्रा दोनों में वृद्धि होती है।

रोशा घास के लिए भूमि का चयन (Land Selection for Palmarosa)

रोशा घास (Palmarosa) के लिए अच्छी जल निकास वाली हल्की दोमट या बलुई मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। यह फसल कम उपजाऊ और पथरीली भूमि में भी उग सकती है, बशर्ते जलभराव न हो। मिट्टी का pH मान 6.5 से 8.0 के बीच होना चाहिए। खेती से पहले खेत की गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाना आवश्यक होता है, जिससे पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकें।

रोशा घास की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Rosha Grass)

रोशा घास (Palmarosa) की खेती के लिए स्वस्थ और रोग-मुक्त पौध सामग्री का चयन अत्यंत आवश्यक है। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय किस्में अधिक सफल पाई जाती हैं, जबकि अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित उन्नत प्रजातियाँ अधिक तेल उत्पादन देती हैं। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे प्रमाणित नर्सरी से पौधे प्राप्त करें, ताकि फसल की गुणवत्ता और उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके।

रोशा घास नर्सरी प्रबंधन और रोपाई (Palmarosa Nursery and Transplanting)

रोशा घास (Palmarosa) का प्रसार मुख्य रूप से पौध विभाजन (स्लिप्स) द्वारा किया जाता है। नर्सरी में पुराने और स्वस्थ पौधों को विभाजित कर रोपण के लिए तैयार किया जाता है। रोपाई के लिए वर्षा ऋतु सबसे उपयुक्त मानी जाती है, जिससे पौधों को प्रारंभिक नमी मिल सके।

खेत में पौधों की रोपाई 45×45 सेमी या 60×45 सेमी की दूरी पर करनी चाहिए। सही दूरी रखने से पौधों को फैलने और अधिक बायोमास उत्पादन में सहायता मिलती है।

रोशा घास के लिए खाद और उर्वरक (Manure and Fertilizers for Palmarosa)

रोशा घास (Palmarosa) से अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता वाला तेल प्राप्त करने के लिए संतुलित पोषण आवश्यक होता है। खेत की तैयारी के समय 10-12 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद मिलानी चाहिए। इसके साथ ही नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित प्रयोग करना लाभकारी होता है।

सामान्यतः 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होते हैं। नाइट्रोजन को दो या तीन भागों में देने से पौधों की वृद्धि और तेल की मात्रा बढ़ती है।

रोशा घास में सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management of Palmarosa)

रोशा घास (Palmarosa) सूखा सहनशील फसल है, इसलिए इसे अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। रोपाई के बाद शुरुआती अवस्था में 1–2 हल्की सिंचाई आवश्यक होती है। इसके बाद 20–25 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त रहती है। बरसात के मौसम में अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन जलभराव से बचाव करना अत्यंत जरूरी है, क्योंकि अधिक पानी से जड़ों में सड़न की समस्या हो सकती है।

रोशा घास की फसल में खरपतवार नियंत्रण (Weed Control in Palmarosa)

प्रारंभिक अवस्था में खरपतवार रोशा घास (Palmarosa) की वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए समय पर निराई-गुड़ाई करना आवश्यक होता है। रोपाई के 30–40 दिन बाद पहली निराई करनी चाहिए। इसके बाद आवश्यकता अनुसार 2-3 बार निराई-गुड़ाई करना लाभकारी रहता है। खरपतवार नियंत्रण से पौधों को पोषक तत्व, नमी और प्रकाश पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।

रोशा घास में रोग और कीट नियंत्रण (Disease and Pest Control in Palmarosa)

रोशा घास (Palmarosa) सामान्यतः रोगों और कीटों से कम प्रभावित होती है, जो इसकी खेती को और भी आसान बनाता है। फिर भी कभी-कभी पत्ती झुलसा रोग या जड़ सड़न की समस्या देखी जा सकती है। इससे बचाव के लिए संतुलित उर्वरक प्रयोग, उचित जल निकासी और स्वस्थ पौध सामग्री का उपयोग करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से जैविक या रासायनिक नियंत्रण उपाय अपनाए जा सकते हैं।

रोशा घास की कटाई और उत्पादन (Rosha Grass Harvesting and Production)

रोशा घास (Palmarosa) की पहली कटाई रोपाई के लगभग 4-5 महीने बाद की जाती है, जब पौधों में फूल आने लगते हैं। इसके बाद हर 3-4 महीने के अंतराल पर कटाई की जा सकती है। एक वर्ष में 3 कटाइयाँ सामान्य रूप से संभव होती हैं। उचित देखभाल के साथ एक हेक्टेयर से 200-250 क्विंटल हरा बायोमास प्राप्त किया जा सकता है।

रोशा घास से तेल निष्कर्षण की विधि (Method of Oil Extraction from Palmarosa)

रोशा घास (Palmarosa) से तेल निकालने के लिए भाप आसवन विधि का उपयोग किया जाता है। कटाई के बाद घास को 24 घंटे तक छाया में हल्का सुखाया जाता है, जिससे तेल की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार होता है। इसके बाद आसवन संयंत्र में भाप द्वारा तेल निकाला जाता है। निकाला गया तेल स्वच्छ कंटेनरों में संग्रहित किया जाता है और बाजार में बिक्री के लिए तैयार किया जाता है।

रोशा घास का आर्थिक महत्व और लाभ (Economic Importance of Rosha Grass)

रोशा घास (Palmarosa) की खेती किसानों के लिए आर्थिक रूप से अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकती है। इसकी खेती में लागत अपेक्षाकृत कम होती है और सुगंधित तेल का बाजार मूल्य अच्छा मिलता है। एक बार रोपाई करने के बाद यह फसल 4-5 वर्षों तक निरंतर उत्पादन देती है, जिससे किसानों को स्थायी आय का स्रोत मिलता है। बढ़ती सुगंध उद्योग की मांग के कारण रोशा घास के तेल का भविष्य उज्ज्वल माना जाता है।

निष्कर्ष: रोशा घास (Palmarosa) की खेती शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के किसानों के लिए एक उत्तम विकल्प है। कम पानी, कम लागत और अधिक लाभ इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। यदि किसान वैज्ञानिक विधि से इसकी खेती करें और सही समय पर कटाई और तेल निष्कर्षण करें, तो रोशा घास उनकी आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न? (FAQs)

पामारोसा की खेती कैसे करें?

पामारोसा (Palmarosa) की खेती एक लाभदायक सुगंधित फसल है, जो कम पानी और कम लागत में होती है, और इसका तेल इत्र, सौंदर्य प्रसाधन व दवाइयों में इस्तेमाल होता है। इसकी खेती के लिए धूपदार, अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी (पीएच 6.5-7.5) और 15-38°C तापमान उपयुक्त है, और इसे बीज या पौध से उगाकर साल में 3-4 बार काटा जा सकता है, जो एक बार लगाने पर 5-6 साल तक चलती है।

पामारोसा के लिए कौन-सी जलवायु उपयुक्त है?

रोशा घास (Palmarosa) उष्ण एवं शुष्क जलवायु में अच्छी बढ़ती है। यह अधिक तापमान सहन कर सकती है और कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फसल है।

पामारोसा के लिए उपयुक्त मिट्टी कौन-सी है?

अच्छी जल निकास वाली हल्की दोमट या बलुई मिट्टी रोशा घास (Palmarosa) के लिए उपयुक्त होती है। जलभराव वाली मिट्टी इसकी खेती के लिए हानिकारक होती है।

पामारोसा की प्रमुख उन्नत किस्में कौन-सी हैं?

पामारोसा (Palmarosa) की प्रमुख उन्नत किस्में हैं: त्रिप्ता, प्रगति, PRC-1 और PRC-2 इत्यादि।

पामारोसा का प्रवर्धन कैसे किया जाता है?

रोशा घास (Palmarosa) का प्रवर्धन मुख्यतः पौध विभाजन या स्लिप्स द्वारा किया जाता है, जिसमें स्वस्थ और विकसित पौधों को अलग कर खेत में रोपित किया जाता है।

पामारोसा की रोपाई का सही समय क्या है?

रोशा घास (Palmarosa) की रोपाई वर्षा ऋतु में सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि इस समय मिट्टी में पर्याप्त नमी उपलब्ध रहती है।

रोशा घास में पौधों की दूरी कितनी होनी चाहिए?

रोशा घास (Palmarosa) की रोपाई सामान्यतः 45×45 सेमी या 60×45 सेमी की दूरी पर की जाती है, जिससे पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त स्थान मिलता है।

पामारोसा में सिंचाई की कितनी जरूरत होती है?

रोशा घास (Palmarosa) कम पानी में उगने वाली फसल है। प्रारंभिक अवस्था में हल्की सिंचाई आवश्यक होती है, बाद में 20–25 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त रहती है।

पामारोसा की पहली कटाई कब की जाती है?

रोशा घास (Palmarosa) की पहली कटाई रोपाई के लगभग 4-5 महीने बाद की जाती है, जब पौधों में फूल आना प्रारंभ हो जाता है।

पामारोसा की एक वर्ष में कितनी कटाइयाँ होती हैं?

रोशा घास (Palmarosa) की एक वर्ष में सामान्यतः 3-4 कटाइयाँ की जा सकती हैं।

पामारोसा से प्रति हेक्टेयर कितनी उपज मिलती है?

पामारोसा (Palmarosa) से प्रति हेक्टेयर लगभग 250–300 क्विंटल हरा बायोमास प्राप्त किया जा सकता है।

पामारोसा से तेल कितनी मात्रा में प्राप्त होता है?

पामारोजा (Palmarosa) की फसल से एक हेक्टेयर से लगभग 80–120 किलोग्राम आवश्यक तेल प्राप्त किया जा सकता है।

क्या रोशा घास को बगीचे में उगाया जा सकता है?

हाँ, रोशा घास (Palmarosa) को बगीचे में उगाया जा सकता है, खासकर यदि आपके पास अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी और भरपूर धूप हो, क्योंकि यह एक सुगंधित और बहुवर्षीय पौधा है जो गर्म, आर्द्र जलवायु पसंद करता है, हालांकि छोटे बगीचों में फैलने की समस्या के कारण इसे सावधानी से लगाना चाहिए, लेकिन यह औषधीय और सुगंधित तेल के लिए व्यावसायिक रूप से भी उगाया जाता है।

रोशा घास के प्रमुख उपयोग क्या है?

रोशा घास (Palmarosa) का प्रमुख उपयोग इसके सुगंधित तेल के लिए होता है, जो इत्र, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, मसाले और दवाइयों (दर्द निवारक, एंटीसेप्टिक, त्वचा रोग) में इस्तेमाल होता है, साथ ही यह पाचन संबंधी समस्याओं, खांसी और बुखार के आयुर्वेदिक उपचार में भी उपयोगी है, और इसकी खेती आर्थिक रूप से लाभकारी है क्योंकि यह बंजर भूमि पर भी उगती है।

रोशा घास के औषधीय लाभ क्या है?

रोशा घास (Palmarosa) जोड़ों के दर्द, श्वसन संबंधी समस्याओं (सर्दी, खांसी), पाचन विकारों (दस्त, भूख न लगना), और त्वचा रोगों के इलाज में उपयोगी है; यह रक्त शोधक, सूजन कम करने वाली, और प्रतिरक्षा बढ़ाने वाली है, जिसका तेल इत्र और दवाइयों में भी इस्तेमाल होता है। यह वात और कफ दोष को संतुलित करने, बुखार, और आंतों के कीड़ों के लिए फायदेमंद है।

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