
How to Grow Milk Thistle in Hindi: दुग्ध रोम या दूध पत्र (Silybum marianum) एक शानदार जड़ी-बूटी है जो अपने औषधीय गुणों और स्वास्थ्य लाभों के लिए जानी जाती है, खासकर लिवर के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में। भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आने वाली यह जड़ी-बूटी दुनिया भर में, जिसमें भारत भी शामिल है, खेती के तरीकों में शामिल हो गई है, जहाँ इसकी खेती धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है।
यह एक वार्षिक या द्विवार्षिक कांटेदार पौधा है। इसके बीजों का व्यावसायिक महत्व है क्योंकि इनमें सिलिमरिन नामक यौगिक होता है। यह लेख भारत में दूध पत्र (Milk Thistle) की खेती की बारीकियों के बारे में बताता है, जिसमें इसकी वानस्पतिक विशेषताओं, ऐतिहासिक महत्व, खेती के लिए आदर्श स्थितियाँ, कीट प्रबंधन रणनीतियों, पैदावार और खेती की तकनीकों पर चर्चा की गई है।
दूध पत्र के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Milk Thistle)
दूध पत्र शीतोष्ण से उपोष्ण जलवायु की फसल है। इसके लिए 15 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। हल्की ठंड पौधों के विकास के लिए अनुकूल होती है, जबकि अत्यधिक गर्मी और अधिक आर्द्रता फसल को नुकसान पहुँचा सकती है।
फूल और बीज बनने की अवस्था में शुष्क मौसम रहने से दूध पत्र (Milk Thistle) के बीजों की गुणवत्ता बेहतर होती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती तभी सफल होती है जब खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था हो।
दूध पत्र के लिए मिट्टी का चयन (Soil Selection for Milk Thistle)
दूध पत्र (Milk Thistle) की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी का पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
अधिक क्षारीय या जलभराव वाली भूमि में इसकी खेती से बचना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ों में सड़न और फफूंद जनित रोगों की संभावना बढ़ जाती है। मध्यम उर्वरता वाली भूमि में भी यह फसल संतोषजनक उपज देती है।
दूध पत्र के लिए भूमि की तैयारी (Land Preparation for Milk Thistle)
दूध पत्र की अच्छी खेती के लिए खेत की तैयारी बहुत महत्वपूर्ण होती है। सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें, जिससे पुराने खरपतवार और कीट नष्ट हो जाएँ। इसके बाद 2 से 3 बार कल्टीवेटर या देशी हल से जुताई करके खेत को भुरभुरा बना लें।
अंतिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर 8 से 10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाना लाभकारी रहता है। समतल खेत सिंचाई और दूध पत्र (Milk Thistle) के पौध विकास दोनों के लिए बेहतर होता है।
दूध पत्र की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Milk Thistle)
भारत में दूध पत्र की खेती अभी सीमित क्षेत्र में हो रही है, इसलिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्रमाणित बीजों का चयन करना सबसे सुरक्षित विकल्प होता है। किसान कृषि विज्ञान केंद्र, औषधीय पौध अनुसंधान संस्थान या कृषि विश्वविद्यालयों से अनुशंसित किस्मों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
उन्नत किस्मों में दूध पत्र (Milk Thistle) का बीज उत्पादन अधिक होता है और उनमें सिलीमारिन की मात्रा भी ज्यादा पाई जाती है। अच्छी किस्म का चयन सीधे तौर पर उपज और बाजार मूल्य दोनों को प्रभावित करता है।
दूध पत्र के बीज और बीज उपचार (Milk Thistle Seeds and Seed Treatment)
दूध पत्र की खेती के लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 8 से 10 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना बहुत जरूरी है, जिससे अंकुरण अच्छा हो और प्रारंभिक रोगों से बचाव हो सके। बीज उपचार के लिए ट्राइकोडर्मा या उपयुक्त फफूंदनाशी का उपयोग किया जा सकता है।
दूध पत्र (Milk Thistle) की जैविक खेती करने वाले किसान नीम खली या नीम तेल से बीज उपचार कर सकते हैं, जिससे पौधे स्वस्थ और मजबूत बनते हैं।
दूध पत्र की बुवाई का सही समय (Right Time for Sowing Milk Thistle)
दूध पत्र की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से नवंबर के बीच माना जाता है। इस समय तापमान और नमी दोनों फसल के अनुकूल होते हैं। बहुत जल्दी बुवाई करने पर पौधे अधिक बढ़ सकते हैं, जबकि देर से बुवाई करने पर उपज घटने की संभावना रहती है।
उत्तर भारत में रबी मौसम की शुरुआत में दूध पत्र (Milk Thistle) की बुवाई करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं। सही समय पर बुवाई करने से फसल की वृद्धि समान और संतुलित रहती है।
दूध पत्र बुवाई की विधि और दूरी (Milk Thistle Sowing Method and Spacing)
दूध पत्र (Milk Thistle) की बुवाई कतारों में करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। कतार से कतार की दूरी 45 से 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर रखें। बीजों को 2 से 3 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए। बहुत गहराई पर बोने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है। कतारों में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई, सिंचाई और अन्य कृषि कार्य करना आसान हो जाता है।
दूध पत्र के लिए खाद और उर्वरक (Manure and Fertilizers for Milk Thistle)
दूध पत्र (Milk Thistle) की अच्छी उपज के लिए संतुलित खाद एवं उर्वरक प्रबंधन आवश्यक है। प्रति हेक्टेयर 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 से 25 किलोग्राम फॉस्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय और शेष आधी पहली सिंचाई के बाद दें। जैविक खाद और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग मिट्टी की उर्वरता और फसल की गुणवत्ता दोनों को बढ़ाता है।
दूध पत्र के लिए सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management for Milk Thistle)
दूध पत्र (Milk Thistle) को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना आवश्यक होता है ताकि बीजों का अंकुरण अच्छा हो सके। इसके बाद 20 से 25 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त रहती है। फूल और बीज बनने की अवस्था में मिट्टी में नमी बनाए रखना जरूरी होता है। जलभराव से बचाव अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे जड़ सड़न और अन्य रोग फैल सकते हैं।
दूध पत्र में खरपतवार नियंत्रण (Weed Control in Milk Thistle)
प्रारंभिक अवस्था में खरपतवार दूध पत्र (Milk Thistle) की फसल को काफी नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसलिए पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 25 से 30 दिन बाद अवश्य करें। आवश्यकता होने पर दूसरी निराई 45 से 50 दिन बाद की जा सकती है।
कतारों में बोई गई फसल में हाथ या यांत्रिक विधि से खरपतवार नियंत्रण करना आसान होता है। रासायनिक खरपतवारनाशकों के बजाय यांत्रिक नियंत्रण अधिक सुरक्षित और किफायती रहता है।
दूध पत्र में कीट और रोग नियंत्रण (Pest and Disease Control in Milk Thistle)
दूध पत्र (Milk Thistle) सामान्यत: कम रोगग्रस्त फसल है, फिर भी कभी-कभी एफिड, इल्ली या फफूंद जनित रोग देखे जा सकते हैं। जैविक नियंत्रण के लिए नीम तेल या नीम आधारित उत्पादों का छिड़काव प्रभावी रहता है। रोगग्रस्त पौधों को समय पर खेत से निकालकर नष्ट करना चाहिए। यदि रोग या कीट का प्रकोप अधिक हो तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही उपयुक्त दवाओं का सीमित मात्रा में प्रयोग करें।
दूध पत्र फसल की अवधि (Milks Thistle Crop Duration)
दूध पत्र (Milk Thistle) की फसल लगभग 140 से 160 दिनों में पूरी तरह तैयार हो जाती है। प्रारंभिक अवस्था में पौधों की वृद्धि धीमी होती है, लेकिन बाद में तेजी से विकास होता है। इस दौरान संतुलित सिंचाई, समय पर निराई-गुड़ाई और उचित पोषण प्रबंधन से फसल की गुणवत्ता और उपज दोनों में वृद्धि होती है। फसल अवधि के दौरान खेत की नियमित निगरानी करना लाभकारी रहता है।
दूध पत्र की कटाई का समय (Milks Thistle Harvesting Time)
जब दूध पत्र (Milk Thistle) के पौधों के फूल पूरी तरह सूखने लगें और बीजों का रंग हल्का भूरा हो जाए, तब कटाई का सही समय माना जाता है। देर से कटाई करने पर बीज झड़ने का खतरा रहता है, जिससे उपज में नुकसान हो सकता है। कटाई दरांती या हाथ से की जा सकती है। कटाई के बाद पौधों को धूप में अच्छी तरह सुखाना चाहिए, ताकि बीजों में नमी न रहे।
दूध पत्र की औसत उपज (Average Yield of Milks Thistle)
सही कृषि तकनीक और प्रबंधन अपनाने पर दूध पत्र (Milk Thistle) से प्रति हेक्टेयर लगभग 10 से 15 क्विंटल बीज की उपज प्राप्त की जा सकती है। उपज मिट्टी की उर्वरता, जलवायु और खेती की विधियों पर निर्भर करती है। जिन बीजों में सिलीमारिन की मात्रा अधिक होती है, उन्हें बाजार में बेहतर मूल्य मिलता है। इसलिए गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है।
दूध पत्र भंडारण की विधि (Milk Thistle Storage Method)
कटाई के बाद दूध पत्र (Milk Thistle) के बीजों को अच्छी तरह सुखाकर साफ करना चाहिए। भंडारण के लिए नमी रहित, ठंडे और हवादार स्थान का चयन करें। बीजों को जूट या प्लास्टिक की बोरियों में भरकर लकड़ी के तख्तों पर रखें, ताकि नमी का संपर्क न हो। सही भंडारण से बीजों की गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है और बाजार में बेहतर दाम प्राप्त होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न? (FAQs)
दूध पत्र (Milk Thistle) एक औषधीय पौधा है, जिसके बीजों में सिलीमारिन नामक तत्व पाया जाता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से लीवर की दवाओं में होता है। फार्मा और आयुर्वेदिक उद्योग में इसकी बढ़ती मांग के कारण किसान इसे नकदी फसल के रूप में उगा रहे हैं।
दूध पत्र (Milk Thistle) एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल है, जो मुख्य रूप से लिवर स्वास्थ्य के लिए उपयोग की जाती है। यह सूखा प्रतिरोधी है और पथरीली या खराब मिट्टी में भी आसानी से उगती है। इसके बीज सीधे मिट्टी में 1-1.5 सेमी की गहराई में और 40-75 सेमी की कतार दूरी पर बोए जाते हैं। यह फसल शरद ऋतु और वसंत ऋतु में उगाई जा सकती है।
दूध पत्र (Milk Thistle) की खेती रबी मौसम में सबसे उपयुक्त रहती है। इसकी बुवाई अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है। इस समय तापमान और नमी अनुकूल होती है, जिससे पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और बीजों की गुणवत्ता बेहतर मिलती है।
दूध पत्र (Milk Thistle) की फसल के लिए अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। मिट्टी का पीएच 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। जलभराव वाली या बहुत अधिक क्षारीय मिट्टी में इसकी खेती से बचना चाहिए।
दूध पत्र (Milk Thistle) की खेती में प्रति हेक्टेयर लगभग 8 से 10 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। अच्छे अंकुरण और स्वस्थ पौधों के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार करना लाभदायक माना जाता है।
दूध पत्र (Milk Thistle) कम पानी वाली फसल है। बुवाई के बाद एक हल्की सिंचाई आवश्यक होती है। इसके बाद 20-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त रहती है। फूल और बीज बनने के समय हल्की नमी बनाए रखना जरूरी होता है।
दूध पत्र (Milk Thistle) की फसल लगभग 140 से 160 दिनों में पूरी तरह तैयार हो जाती है। इस अवधि में सही सिंचाई, निराई-गुड़ाई और खाद प्रबंधन करने से उपज और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है।
दूध पत्र (Milk Thistle) की फसल सामान्यतः कम रोगग्रस्त होती है। फिर भी कभी-कभी एफिड या फफूंद जनित रोग दिखाई दे सकते हैं। नीम तेल का छिड़काव जैविक नियंत्रण के लिए प्रभावी रहता है और गंभीर स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।
जब दूध पत्र (Milk Thistle) के पौधों के फूल सूख जाएँ और बीज हल्के भूरे रंग के हो जाएँ, तब कटाई का सही समय होता है। देर से कटाई करने पर बीज झड़ने का खतरा रहता है, जिससे उपज में नुकसान हो सकता है।
उचित कृषि तकनीक अपनाने पर दूध पत्र (Milk Thistle) से प्रति हेक्टेयर लगभग 10 से 15 क्विंटल बीज की उपज प्राप्त की जा सकती है। उपज मिट्टी, जलवायु और प्रबंधन पर निर्भर करती है। अच्छी गुणवत्ता के बीजों का बाजार मूल्य भी अधिक मिलता है।
दूध पत्र (Milk Thistle) के बीजों की बिक्री औषधीय मंडियों, आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं, फार्मा कंपनियों या अनुबंध खेती के माध्यम से की जा सकती है। सही संपर्क और गुणवत्ता बनाए रखने पर किसान को इस फसल से अच्छा मुनाफा मिलता है।
दूध पत्र (Milk Thistle) की खेती मुख्य रूप से इसके बीजों से सिलिमारिन नामक यौगिक निकालने के लिए की जाती है, जो एक शक्तिशाली औषधीय तत्व है। इसका उपयोग लिवर डिटॉक्स, हेपेटाइटिस, सिरोसिस और यकृत की सुरक्षा के लिए हर्बल दवाएं, कैप्सूल, और अर्क बनाने में होता है। इसके अलावा, इसकी युवा पत्तियां और फूल खाने के काम भी आते हैं।
हाँ, दूध पत्र (Milk Thistle) को बगीचे में आसानी से उगाया जा सकता है। यह एक कठोर, तेजी से बढ़ने वाला पौधा है जो विभिन्न प्रकार की मिट्टी में पनपता है और सूखे के प्रति प्रतिरोधी है। इसके गुलाबी-बैंगनी फूल बगीचे की सुंदरता बढ़ाते हैं और मधुमक्खियों को आकर्षित करते हैं, लेकिन ध्यान रहे कि यह आक्रामक रूप से फैल सकता है, इसलिए इसे नियंत्रित करना आवश्यक है।





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