
How to Grow a Flame lily in Hindi: अग्निशिखा या कलिहारी, जिसे ग्लोरियोसा सुपरबा के नाम से भी जाना जाता है, एक बहुत ही खूबसूरत फूल वाला पौधा है, जो भारत सहित ट्रॉपिकल इलाकों में पाया जाता है। अपने चमकीले लाल और पीले फूलों के लिए मशहूर, यह बारहमासी बेल न सिर्फ बगीचों और लैंडस्केप की सुंदरता बढ़ाती है, बल्कि इसके औषधीय गुणों और आर्थिक क्षमता के लिए भी इसे महत्व दिया जाता है।
जैसे-जैसे इस औषधीय गुणों वाली टिकाऊ और मुनाफे वाली खेती में लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है, कलिहारी की खेती किसानों और बागवानों दोनों के बीच ध्यान खींच रही है। यह लेख अग्नि शिखा (Flame lily) की खेती के जरूरी पहलुओं पर गहराई से बात करता है, जिसमें आदर्श उगाने की स्थिति और पौधे लगाने की तकनीकों से लेकर कीट प्रबंधन और उपज तक सब कुछ शामिल है।
कलिहारी के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Flame lily)
कलिहारी (Flame lily) की सफल खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी का चयन अत्यंत आवश्यक है। यह पौधा उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु में अच्छी तरह पनपता है। 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान इसकी वृद्धि के लिए आदर्श माना जाता है। मध्यम से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र इसके लिए अनुकूल होते हैं, लेकिन खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए।
कलिहारी के लिए भूमि का चयन (Soil Selection for Flame lily)
कलिहारी (Flame lily) की खेती के लिए भूमि हल्की दोमट या बलुई दोमट होनी चाहिए, जिसमें जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो। मिट्टी का पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच उपयुक्त रहता है। भारी और चिकनी मिट्टी में इसकी खेती से बचना चाहिए, क्योंकि इससे कंद सड़ने की संभावना बढ़ जाती है। भूमि ऐसी होनी चाहिए जहाँ पानी जमा न हो, क्योंकि इसे कंद सड़ने की समस्या हो सकती है।
कलिहारी की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Gloriosa Lily)
कलिहारी की खेती प्राय: स्थानीय प्रजातियों के माध्यम से की जाती है, क्योंकि इसकी कोई औपचारिक रूप से अधिसूचित उन्नत किस्में अभी उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी विभिन्न क्षेत्रों में किसानों द्वारा चयनित कुछ बेहतर प्रजातियाँ प्रचलन में हैं। इनमें पीले फूल वाली, लाल और पीले मिश्रित रंग की फूल वाली तथा अधिक कंद उत्पादन देने वाली प्रजातियाँ शामिल हैं।
इन स्थानीय कलिहारी (Flame lily) की किस्मों का चयन करते समय किसान यह ध्यान रखें कि पौधे स्वस्थ हों, फूल अधिक लगते हों और कंदों का आकार अच्छा हो। क्षेत्र विशेष के अनुसार अनुकूल प्रजाति का चयन करने से उत्पादन और लाभ दोनों में वृद्धि संभव है।
कलिहारी के लिए खेत की तैयारी (Field Preparation for Flame lily)
कलिहारी (Flame lily) की खेती में खेत की तैयारी का विशेष महत्व है, क्योंकि कंद मिट्टी के अंदर विकसित होते हैं। सबसे पहले खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए, जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए और हानिकारक कीट नष्ट हो जाएँ।
इसके बाद 2 से 3 बार हल्की जुताई कर मिट्टी को अच्छी तरह तैयार करें। अंतिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर 15 से 20 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में मिलाएँ। इसके बाद खेत को समतल कर क्यारियाँ या मेड़ें बनाएँ, ताकि जल निकास सही रहे और कंदों को सड़न से बचाया जा सके।
कलिहारी की बुवाई का समय (Sowing Time for Flame lily)
कलिहारी की बुवाई का सही समय फसल की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सामान्यत: इसकी बुवाई खरीफ मौसम की शुरुआत में की जाती है। उत्तर और मध्य भारत में जून से जुलाई का समय उपयुक्त माना जाता है, जबकि दक्षिण भारत में मई से जून तक बुवाई की जा सकती है।
इस समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होती है, जिससे कलिहारी (Flame lily) के कंदों का अंकुरण अच्छी तरह होता है। समय पर बुवाई करने से पौधों की प्रारंभिक वृद्धि मजबूत होती है और आगे चलकर कंदों का विकास भी बेहतर होता है, जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है।
कलिहारी के लिए बुवाई की विधि (Sowing Method for Flame lily)
कलिहारी (Flame lily) की खेती मुख्य रूप से कंदों के माध्यम से की जाती है, क्योंकि यह विधि अधिक विश्वसनीय और लाभकारी होती है। बुवाई के लिए स्वस्थ, पूर्ण विकसित और रोगमुक्त कंदों का चयन करना चाहिए। कंदों को 8 से 10 सेंटीमीटर की गहराई पर रोपित किया जाता है।
कतार से कतार की दूरी लगभग 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखना उचित रहता है। बीज द्वारा भी खेती संभव है, लेकिन इसमें पौधों को तैयार होने में अधिक समय लगता है, इसलिए व्यावसायिक स्तर पर इसका प्रयोग कम किया जाता है।
कलिहारी के लिए खाद और उर्वरक (Manure and Fertilizers for Flame lily)
कलिहारी की अच्छी उपज के लिए संतुलित खाद एवं उर्वरक प्रबंधन आवश्यक है। जैविक खाद के रूप में प्रति हेक्टेयर 15 से 20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद देना चाहिए, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। इसके साथ रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन 60 से 80 किलोग्राम, फास्फोरस 40 से 50 किलोग्राम और पोटाश 40 से 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से देना लाभकारी होता है।
नाइट्रोजन की आधी मात्रा कलिहारी (Flame lily) की बुवाई के समय और शेष आधी मात्रा पौधों की बढ़वार के समय देना चाहिए, जिससे कंदों का विकास बेहतर होता है।
कलिहारी के लिए सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management for Flame lily)
कलिहारी (Flame lily) की फसल में सिंचाई का संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए, ताकि कंदों का अंकुरण अच्छे से हो सके। इसके बाद 15 से 20 दिन के अंतराल पर आवश्यकता अनुसार सिंचाई करें।
वर्षा ऋतु में अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि जलभराव से बचाव करना अधिक महत्वपूर्ण होता है। अधिक पानी जमा होने से कंद सड़ सकते हैं, जिससे फसल को भारी नुकसान हो सकता है। इसलिए खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए।
कलिहारी में खरपतवार नियंत्रण (Weed Control in Flame lily Crop)
कलिहारी (Flame lily) की प्रारंभिक अवस्था में खरपतवार नियंत्रण अत्यंत आवश्यक होता है, क्योंकि इस समय पौधे धीरे-धीरे बढ़ते हैं। खरपतवार पौधों से पोषक तत्व, पानी और प्रकाश छीन लेते हैं, जिससे मुख्य फसल कमजोर हो सकती है। इसके लिए 2 से 3 बार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।
पहली निराई बुवाई के 20-25 दिन बाद और दूसरी 40-45 दिन बाद करना लाभकारी होता है। समय पर खरपतवार नियंत्रण से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और कंदों का विकास भी बेहतर होता है।
कलिहारी के पौधों को सहारा देना (Providing support to Flame lily plants)
कलिहारी एक बेलनुमा पौधा है, जिसकी वृद्धि ऊपर की ओर होती है, इसलिए इसे सहारे की आवश्यकता होती है। सहारा देने के लिए बाँस, लकड़ी की खूंटियाँ, तार या जाल का प्रयोग किया जा सकता है। पौधों के बढ़ने के साथ बेलों को धीरे-धीरे सहारे पर चढ़ाया जाता है।
सहारा देने से कलिहारी (Flame lily) के पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे रोगों का प्रकोप कम होता है। इसके अलावा फूलों की संख्या बढ़ती है और अंततः कंदों की गुणवत्ता एवं उत्पादन में वृद्धि होती है।
कलिहारी में रोग और कीट नियंत्रण (Disease and Pest Control in Flame lily)
कलिहारी (Flame lily) की फसल में कुछ रोग और कीट नुकसान पहुँचा सकते हैं। प्रमुख रोगों में कंद सड़न और पत्ती धब्बा रोग शामिल हैं, जो अधिक नमी और संक्रमित कंदों के कारण होते हैं। कीटों में दीमक और तना छेदक प्रमुख हैं।
इनसे बचाव के लिए रोगमुक्त कंदों का उपयोग करना चाहिए और फसल चक्र अपनाना चाहिए। खेत की नियमित निगरानी कर प्रारंभिक अवस्था में ही नियंत्रण उपाय अपनाने से नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कलिहारी की फसल की देखभाल (Care of the Gloriosa Lily Crop)
कलिहारी (Flame lily) की अच्छी फसल के लिए नियमित देखभाल बहुत जरूरी है। खेत का समय-समय पर निरीक्षण करें और कमजोर या रोगग्रस्त पौधों को हटा दें। बेलों को सही दिशा में फैलाएँ और सहारे पर ठीक से बाँधें। यदि किसी स्थान पर पौधों की वृद्धि कम दिखाई दे तो वहाँ मिट्टी की हल्की गुड़ाई करें। इस प्रकार की नियमित देखभाल से पौधों का विकास समान रूप से होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है।
कलिहारी फसल की खुदाई व कटाई (Harvesting and Digging of Flame lily)
कलिहारी के कंद लगभग 7 से 8 महीने में पूरी तरह विकसित हो जाते हैं। जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने लगें और धीरे-धीरे सूख जाएँ, तब खुदाई का सही समय होता है। खुदाई के लिए फावड़ा या कुदाल का प्रयोग सावधानीपूर्वक करें, ताकि कंद टूटें नहीं।
खुदाई के बाद कलिहारी (Flame lily) के कंदों को मिट्टी से साफ कर लें और उन्हें छाया में सुखाएँ। सही समय पर और सावधानी से की गई खुदाई से कंदों की गुणवत्ता बनी रहती है।
कलिहारी की खेती से उपज (Yield from Flame lily Cultivation)
उचित कृषि तकनीक और सही देखभाल अपनाने पर कलिहारी से अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 15 से 25 क्विंटल कंदों की उपज मिलती है। उपज की मात्रा भूमि की उर्वरता, जलवायु, कंदों की गुणवत्ता और खेती के तरीकों पर निर्भर करती है।
यदि किसान वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाएँ और समय पर सभी कृषि कार्य करें, तो कलिहारी (Flame lily) की उपज में और भी वृद्धि संभव है, जिससे आर्थिक लाभ अधिक होता है।
कलिहारी का भंडारण (Storage of Gloriosa Lily)
खुदाई के बाद कलिहारी (Flame lily) के कंदों का सही भंडारण अत्यंत आवश्यक होता है। कंदों को पहले छाया में अच्छी तरह सुखाना चाहिए, ताकि उनमें नमी न रहे। इसके बाद उन्हें हवादार, सूखे और ठंडे स्थान पर संग्रहित करें। भंडारण के दौरान नमी से विशेष रूप से बचाव करें, क्योंकि नमी के कारण कंद सड़ सकते हैं। उचित भंडारण से कंद लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं और बाजार में अच्छी कीमत दिलाते हैं।
कलिहारी से सावधानियाँ (Precautions with Gloriosa Lily)
कलिहारी का पौधा विषैला होता है, इसलिए इसकी खेती में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। इसके कंद और बीजों का सीधा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। खेत में काम करते समय दस्ताने पहनना चाहिए और हाथों को अच्छी तरह साफ करना चाहिए।
कलिहारी (Flame lily) के कंदों को बच्चों और पशुओं की पहुँच से दूर रखें। इन सावधानियों का पालन करने से खेती सुरक्षित रहती है और किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचा जा सकता है।
निष्कर्ष: कलिहारी (Flame lily) की खेती उचित जानकारी, वैज्ञानिक तकनीक और सावधानी के साथ की जाए तो यह किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक प्रभावी साधन बन सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न? (FAQs)
अग्निशिखा (Flame lily) एक औषधीय बेलनुमा पौधा है, जिसका वैज्ञानिक नाम ग्लोरियोसा सुपरबा है। इसके फूल आग की लपटों जैसे दिखते हैं, इसलिए इसे अग्निशिखा कहा जाता है। हिंदी में इसे कलिहारी और संस्कृत में लांगुली कहते हैं।
अग्निशिखा या कलिहारी (Flame lily) की खेती एक अत्यधिक लाभदायक औषधीय खेती है, जो 1 एकड़ से प्रति वर्ष 100-150 किग्रा बीज और 50-80 किग्रा कंद उत्पादन दे सकती है। मई-जून में कंदों के माध्यम से बुवाई की जाने वाली यह एक बेलनुमा फसल है, जो 4-5 वर्ष तक उपज देती है और इसे अच्छी जल निकासी वाली बलुई मिट्टी की आवश्यकता होती है।
अग्निशिखा (Flame lily) के लिए उष्ण और उपोष्ण जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है। 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और मध्यम वर्षा इसकी अच्छी वृद्धि के लिए आदर्श परिस्थितियाँ प्रदान करती हैं।
हल्की दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो, अग्निशिखा (Flame lily) की खेती के लिए सर्वोत्तम रहती है। मिट्टी का पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
अग्निशिखा (Flame lily) की बुवाई सामान्यतः खरीफ मौसम की शुरुआत में की जाती है। उत्तर भारत में जून–जुलाई तथा दक्षिण भारत में मई-जून का समय उपयुक्त माना जाता है, जब मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है।
व्यावसायिक खेती के लिए अग्निशिखा (Flame lily) की बुवाई कंदों द्वारा करना अधिक उपयुक्त होता है। बीज से खेती संभव है, लेकिन इसमें फसल तैयार होने में अधिक समय लगता है और उत्पादन भी देर से मिलता है।
सामान्य दूरी के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 20,000 से 25,000 स्वस्थ और रोगमुक्त कंदों की आवश्यकता होती है। कलिहारी (Flame lily) के कंदों की गुणवत्ता सीधे उपज और लाभ को प्रभावित करती है।
अग्निशिखा (Flame lily) की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। बुवाई के बाद हल्की सिंचाई तथा बाद में 15–20 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई पर्याप्त होती है। जलभराव से बचाव जरूरी है।
हाँ, अग्निशिखा (Flame lily) एक बेलनुमा पौधा है, इसलिए इसे सहारे की आवश्यकता होती है। बाँस, तार या जाल से सहारा देने पर पौधों को अच्छा प्रकाश मिलता है और फूल व कंद उत्पादन बढ़ता है।
अग्निशिखा (Flame lily) में कंद सड़न और पत्ती धब्बा रोग प्रमुख हैं। ये रोग अधिक नमी, खराब जल निकास और संक्रमित कंदों के कारण होते हैं, जिससे उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
अग्निशिखा (Flame lily) की फसल में दीमक और तना छेदक मुख्य कीट हैं। ये कंद और तने को नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और उपज में कमी आ सकती है।
अग्निशिखा (Flame lily) की फसल सामान्यतः बुवाई के लगभग 7 से 8 महीने बाद तैयार हो जाती है। जब पौधों की पत्तियाँ पीली होकर सूखने लगें, तब कंदों की खुदाई की जाती है।
सही देखभाल और प्रबंधन से अग्निशिखा (Flame lily) से प्रति हेक्टेयर लगभग 15 से 25 क्विंटल कंदों की उपज प्राप्त की जा सकती है। उपज भूमि, जलवायु और खेती की विधि पर निर्भर करती है।
खुदाई के बाद कंदों को छाया में अच्छी तरह सुखाकर सूखे, ठंडे और हवादार स्थान पर रखना चाहिए। भंडारण के दौरान नमी से बचाव आवश्यक है, ताकि कलिहारी (Flame lily) के कंद खराब न हों।
अग्निशिखा (Flame lily) के कंद आयुर्वेदिक दवा निर्माता, हर्बल कंपनियाँ और औषधीय फसल मंडियों में बेचे जाते हैं। अनुबंध खेती के माध्यम से किसानों को बेहतर और सुनिश्चित मूल्य मिल सकता है।
हाँ, अग्निशिखा (Flame lily) का पौधा, कंद और बीज विषैले होते हैं। इनका सीधा सेवन हानिकारक हो सकता है, इसलिए खेती के समय सावधानी बरतना और बच्चों व पशुओं से दूर रखना आवश्यक है।
अग्निशिखा (Flame lily) की खेती मुख्य रूप से औषधीय उपयोग के लिए की जाती है। इसके कंद और बीजों का प्रयोग आयुर्वेदिक, यूनानी और आधुनिक दवाइयों में होता है। साथ ही यह किसानों के लिए एक लाभकारी नकदी फसल भी है।
हाँ, कलिहारी (Flame lily), जिसे ग्लोरी लिली या अग्निशिखा भी कहते हैं, को बगीचे में आसानी से उगाया जा सकता है। यह एक सुंदर फूल वाली बेल है, जो गर्म और नमी वाले वातावरण (25-40°C) में पनपती है। इसे बीज या कंद के द्वारा लगाया जा सकता है, लेकिन कंद द्वारा रोपण सबसे उत्तम माना जाता है।
अग्निशिखा (Flame lily) एक अत्यंत गुणकारी औषधीय पौधा है, जिसके कंद का उपयोग मुख्य रूप से गठिया, जोड़ों के दर्द, त्वचा विकारों और सूजन को कम करने के लिए किया जाता है। यह जड़ी-बूटी एंटीहेलमिंटिक, दर्द निवारक और विषहर (जहर कम करने वाली) गुणों के लिए जानी जाती है, जिसका उपयोग विशेष रूप से आमवात (गठिया) के उपचार में किया जाता है।





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